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जोहार रांची, 21 फरवरी। झारखंड के संथाल परगना से लेकर राज्य के दूसरे क्षेत्रों में बाहा पर्व (Baha Parv) की धूम है। संथाली समुदाय (Santhal Samuday) द्वारा मनाया जाने वाला बाहा पर्व एक पारंपरिक होली (Holi) जैसा पर्व है। यह पर्व पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा का एक रूप है, जिसे पूरे विधि-विधान और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बाहा पर्व के दौरान समाज में भाईचारे और सांस्कृतिक उत्साह का माहौल देखने को मिलता है।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने संदेश में कहते हैं, “प्रकृति पर्व बाहा परब के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और जोहार। यह पर्व हमारी आदिवासी परंपराओं, प्रकृति के प्रति आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। बाहा परब हमें जल, जंगल और जमीन के प्रति कृतज्ञता तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है।”
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बाहा पर्व मनाने की तिथियां अलग-अलग हो सकती हैं। पर्व को मुख्य रूप से तीन दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें हर दिन की उपासना प्रकृति को समर्पित है। पहले दिन ‘बोंगा उम नड़का’ यानी शुद्धिकरण और स्नान की रस्म होती है। इसके अगले दिन ‘बोंगा पेरेज उमड़’ का आयोजन होता है। इसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बाहा पूजा संपन्न की जाती है। तीसरे दिन ‘बाहा सेंदरा’ का आयोजन किया जाता है।
कई जगहों पर अतु बाहा का भी भव्य आयोजन
कई जगहों पर पर्व के बाद अतु बाहा का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर साल और महुआ के फूलों के साथ प्रकृति की आराधना करते हैं। वहीं, ‘दिशोम बाहा’ को भी पूरे उत्साह से आयोजित किया जाता है। यह एक केंद्रीय समागम है, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के लोग एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करते हैं। बाहा पर्व के दौरान नायके बाबा सखुआ के फूल बांटते हैं। इसे ग्रामीण अत्यंत पवित्र मानते हैं।
बाहा पर्व प्रकृति, फूलों और नई ऊर्जा का प्रतीक
संथाल समाज के लोगों का मानना है कि मरांग बुरु और जाहेर आयो की आराधना संथाल समाज की प्राचीन परंपरा का अभिन्न अंग है। बाहा बोंगा पर्व प्रकृति, फूलों और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर गांव के जाहेर थान में विधि-विधान से पूजा संपन्न की जाती है। इस दौरान लोग पारंपरिक वेशभूषा धारण करते हैं। मरांग बुरु जुग जाहेर बाहा बोंगा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, प्रकृति संरक्षण और सामूहिक सद्भाव का संदेश देता है। राज्य सरकार भी इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में प्रतिबद्ध है।
पर्व को लेकर दिलचस्प कहानी, आप भी पढ़िए
इस पर्व को लेकर पौराणिक कथा भी है। इसके अनुसार हाराता बीर में संथाल समुदाय के लोग शांतिपूर्वक रहते थे। वहां किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अभिमान में संथाल लोग अपने सृजनकर्ता ठाकुर जी का स्मरण भूल गए। ठाकुर गोसाई मनुष्यों के व्यवहार से काफी नाराज हुए। हालांकि, पिचलू हड़ाम और पिचलू बुड़ही ठाकुर जी का स्मरण करते थे। जब इन दोनों को जानकारी हुई तो बहुत चिंतित हुए और उनसे नाराजगी छोड़ने का आग्रह किया। पिचलू हड़ाम और पिचलू बुड़ही ने संथालों को बहुत समझाया। लेकिन, उन लोगों ने एक न सुनी। नाराज होकर ठाकुर जी ने धरती से मनुष्यों को समाप्त करने के लिए पांच दिन और रात तक अग्नि वर्षा की। इससे सभी मनुष्य जलकर खत्म हो गए। ठाकुर जी ने अग्नि वर्षा करने से पूर्व मानव के एक जोड़े के साथ सभी जीवों का एक-एक जोड़ा सुरक्षित स्थान पर भेज दिया था। उसके बाद धरती पर फिर मानव वंश की वृद्धि हुई।
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