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संथाल हूल विद्रोह : फूलो-झानो और अंग्रेजों के खिलाफ जनयुद्ध, ‘उलगुलान ओरथेन’ की अमिट कहानी

इतिहासकारों के मुताबिक, झारखंड पर लंबे समय तक अंग्रेजों का पूर्ण अधिकार नहीं हो सका था। इस धरती पर लगातार विद्रोह होते रहते थे। इसे कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार जमींदारों की मदद लेती थी। इसके बावजूद आदिवासियों का विद्रोह फिर शुरू हो जाता था। उनकी जल, जंगल और जमीन की लड़ाई से अंग्रेजी शासन को काफी मुश्किलें होती रहती थीं।
जोहार संथाल डेस्क 28.02.2026
फोटो - एआई/मेटा

फोटो - एआई/मेटा

जोहार दुमका, 28 फरवरी। झारखंड का संथाल परगना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हूल विद्रोह (Santhal Hool Vidroh) के लिए प्रसिद्ध है। इसी इलाके की संथाल समुदाय से ताल्लुक रखने वाली फूलो मुर्मु (Phulo Murmu) और झानो मुर्मु (Jhano Murmu) ने भी क्रांति की मशाल हाथ में थामी और अंग्रेजी हुकूमत की नींव पर करारा चोट किया। दोनों क्रांतिकारी महिलाएं अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह और निडरता के लिए इतिहास में अमर हैं। इन दोनों महिलाओं का काफी सम्मान है और इनके नाम पर राज्य में कई योजनाएं चलाई जाती हैं, जो इनकी महान उपलब्धियों को समर्पित हैं। इन दोनों विद्रोहियों को ‘उलगुलान ओरथेन’ (क्रांति की महिला) नाम दिया गया है।

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क्रांति की धरती भोगनाडीह में फूलो और झानो का जन्म

झारखंड की संथाल जनजाति के मुर्मु कबीले से संबंधित फूलो और झानो का जन्म क्रांति की धरती भोगनाडीह में हुआ था। उस समय भारत पर ब्रिटिश हुकूमत का राज था। हर तरफ अत्याचार, शोषण और सरकारी लूट थी। उस दौर में फूलो-झानो ने अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। दोनों ने अपने भाइयों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का नेतृत्व किया। साल 1855 में ब्रिटिश सत्ता, साहूकारी और जमींदारी के खिलाफ संथाल विद्रोह हुआ। ब्रिटिश सरकार से अपनी जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए आदिवासियों ने जन विद्रोह छेड़ दिया। इस विद्रोह में फूलो और झानो ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

झारखंड पर लंबे समय तक अंग्रेजी अधिकार नहीं हो सका

भारत के दूसरे हिस्से की तरह झारखंड में भी अंग्रेजी सरकार आदिवासियों के संसाधनों पर कब्जा करने लगी। उनका निशाना मुख्य रूप से जल, जंगल और जमीन था, जिसे आदिवासी पूजते थे। इसका परिणाम आदिवासियों के विद्रोह के रूप में सामने आया, जिसे हूल क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक, झारखंड पर लंबे समय तक अंग्रेजों का पूर्ण अधिकार नहीं हो सका था। इस धरती पर लगातार विद्रोह होते रहते थे। इसे कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार जमींदारों की मदद लेती थी। इसके बावजूद आदिवासियों का विद्रोह फिर शुरू हो जाता था। उनकी जल, जंगल और जमीन की लड़ाई से अंग्रेजी शासन को काफी मुश्किलें होती रहती थीं।

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1855 में अंग्रेजों, साहूकारों-जमींदारों के खिलाफ हूल विद्रोह

इतिहासकारों की मानें तो 1855 में ब्रिटिश सत्ता, साहूकार और जमींदारों के खिलाफ संथाल विद्रोह किया गया था। अंग्रेजी हुकूमत से जल, जंगल और जमीन को बचाने की कसम खा चुके आदिवासियों ने क्रांति शुरू कर दी थी। सिदो, कान्हो, चांद और भैरव ने संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया। फूलो और झानो इनकी बहनें थीं। उन्होंने अपने भाइयों के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया था। फूलो-झानो ने आदिवासी समाज की महिलाओं को सशस्त्र क्रांति में भाग लेने के लिए तैयार किया। दोनों बहनें भाइयों के संदेश को भी दूसरे विद्रोहियों तक पहुंचाने का काम करती थीं। दोनों साहूकारों और जमींदारों पर भी नजर रखकर जानकारियां जुटाती थीं।

दोनों ने तीर-धनुष और भाले के प्रयोग के बारे में ट्रेनिंग दी

फूलो और झानो अपने साथ हमेशा कुल्हाड़ी रखती थीं। उनका मुख्य काम अंग्रेजी सरकार और उसके अधिकारियों से जुड़ी जानकारियों को अपने भाइयों और दूसरे क्रांतिकारियों तक पहुंचाना था। फूलो-झानो ने अपनी सूझबूझ से संगठन को मजबूती भी दी थी। दोनों ने तीर-धनुष और भाले के प्रयोग के बारे में ट्रेनिंग दी। फूलो और झानो खुद हाथों में तलवार और कुल्हाड़ी लेकर संगठन का नेतृत्व करती थीं। उनके कारण भोगनाडीह में जमींदारों और महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह गहराता गया और पूरे संथाल क्षेत्र में फैल गया। इतिहासकारों का मानना है कि फूलो और झानो के संघर्ष के बिना संथाल हूल विद्रोह सफल नहीं हो सकता था।

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विद्रोह के बाद आदिवासी जमीन संरक्षण के लिए कानून बने

मशहूर विचारक कार्ल मार्क्स ने अपनी किताब ‘नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में हूल क्रांति को प्रथम जन क्रांति बताया था। इसे आजादी की लड़ाई का प्रथम विद्रोह भी कहा जाता है। यह अंग्रेजों के खिलाफ पहली संगठित लड़ाई थी। इसे अंग्रेजी सरकार को दबाने में काफी समय लग गया था। रांची के वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ चौधरी ने इतिहास की किताबों का हवाला देते हुए बताया, ”फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू अपने भाइयों के साथ युद्ध में कूद गईं और शहीद होने से पहले 21 ब्रिटिश सैनिकों को मार डाला था। बड़ी संख्या में विद्रोह में शामिल आदिवासियों को भी जान गंवानी पड़ी थी। इस विद्रोह के बाद आदिवासी जमीन संरक्षण को लेकर कुछ अधिनियम बने। इसमें छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (1912) शामिल हैं।”

—–समाप्त—–

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