Photo: Sunny Khan, Madhupur.
जोहार देवघर, 20 दिसंबर। माघी पूर्णिमा को मधुपुर की हवाओं में एक अनोखी मधुर मादकता सुगंध बिखेरती है। यहां हजारों श्रद्धालु और भारी संख्या में पर्यटक हर साल आस्था और श्रद्धा केंद्र देवालय परिसर में आते हैं। यहां सिद्धिप्राप्त महान विभूति बंधु धर्म के प्रेरक श्री श्रीधर सरस्वती के मूर्ति के सम्मुख निवेदन करते दिखते हैं।
मधुपुर मुख्य रेलखंड और गिरिडीह रेलखंड पर अवस्थित मधुपुर जंक्शन से करीब 2 किलोमीटर पश्चिम दिशा में रेलवे टीटीसी मैदान के समीप अवस्थित बंधु आश्रम देवालय सामाजिक समरसता का अद्भुत नमूना है। यहां ऊंच- नीच, जात- पात, भेदभाव की परंपरा को तोड़ते हुए मातृत्व,बंधुत्व और मानवीय संवेदना की अलग जगाते हुए हजारों श्रद्धालु संस्था के गौरव को बढ़ा रहे हैं। माघी पूर्णिमा के दिन यहां वार्षिकोत्सव मनाया जाता है।
कुटिया को मानव सेवा और आध्यात्मिक केंद्र बनाया
सामाजिक समरसता के इस अद्भुत मंदिर की स्थापना 1935 ईस्वी में सिद्ध पुरुष बंधु ओमकारनाथ सरस्वती ने की थी लेकिन बंधु आश्रम के प्रणेता के रूप में बंधुधर्म समाज के सिद्धि पुरुष श्री श्रीधर नाथ सरस्वती को संस्थापक रूप में माना जाता है। बंधु श्रीश्रीधर नाथ सरस्वती का जन्म बिक्रमपुर ढाका बांग्लादेश में हुआ था। बचपन से ही साधु- सन्यासियों के प्रति इनका गहरा जुड़ाव था।
2 मई 1901 में जन्मे इस महान पुरुष को अनित्य वस्तुओं का आकर्षण छू न सका। यह कोलकाता मेडिकल कॉलेज के प्राध्यापक और रसायन विज्ञान के विद्वान एमएस, एफआरसीएस लंदन होते हुए भी दीन दुखियों की सेवा भावना में तल्लीन हुए। 70 के दशक में अपनी पुरानी कुटिया को मानव सेवा और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
रामकृष्ण भट्टाचार्य (छोटो ठाकुर) ने परंपरा को संभाला
बंधु धर्म के उद्देश्यों को देश- विदेशों में प्रचार-प्रसार किया। सर्वधर्म समभाव को उन्होंने केंद्र में रखा और स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक रहने के प्रति सचेत किया। सांसारिक मोह माया से दूर रहने वाले सिद्ध पुरुष ने 97 वर्ष की आयु में समाधि ली। मां काली और नारायण मंत्र के प्रति उनका लगाव बेहद महत्वपूर्ण रहा है। बाद में विद्वान रामकृष्ण भट्टाचार्य (छोटो ठाकुर) ने परंपरा को संभाला। उनके समाधिस्थ होने के उपरांत उनके पुत्र मलय भट्टाचार्य देवालय की परंपरा को संभाल रहे हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि दुनिया में मात्र एक ही धर्म है, वह है बंधु धर्म। सभी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोग एक साथ मिलजुल कर रहे। सभी एक दूसरे के सुख- दुख में काम आए, यही तो इंसानियत और मानवता है। असहाय बीमारी अवस्था में , श्मशान और कब्रिस्तान में जो व्यक्ति दुख में साथ होता है वह सबसे बड़ा बंधु है।
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लगभग 7 एकड़ में फैले देवालय परिसर में बकायदा यज्ञ स्थल, प्रार्थना घर, ठाकुरबाड़ी, चिकित्सालय, अतिथि आवास, सिंहद्वार, नाटक मंच और समारोह स्थल है। पहले माघी पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता था। लेकिन, कोरोना के कारण पिछले 5 वर्षों में यहां मेला नहीं लगता है। धीरे-धीरे यह परंपरा लुप्त हो रही है। देवालय की प्रसिद्धि तो देश के विभिन्न राज्यों में है लेकिन देवघर जिला प्रशासन और झारखंड सरकार इसके प्रति अब तक उदासीन रही है।
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