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लुगु बुरू घंटा बाड़ी : संथालों के आराध्य देवता और धर्म गुरु का निवास, प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्म का संगम

लुगु बुरु का शाब्दिक अर्थ होता है 'श्रद्धेय देवता पहाड़।' यह नाम उस पर्वत को संदर्भित करता है, जो संथाल समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत पूजनीय है। यह स्थान उनके आराध्य देवता की उपस्थिति और प्रकृति की पूजा के केंद्र के रूप में जाना जाता है। यह स्थान हरी-भरी पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है।
जोहार संथाल डेस्क 03.03.2026
फोटो - बोकारो जिला प्रशासन

फोटो - बोकारो जिला प्रशासन

जोहार बोकारो, 3 मार्च। लुगु बुरु घंटा बाड़ी धोरोम गाढ़ (Lugu Buru Ghanta Badi) सदियों से संथाल आदिवासियों (Santhalon Ke Devta) की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित है तथा संथाल आदिवासियों के लिए गौरवशाली अतीत एवं सांस्कृतिक धार्मिक आस्था से जुड़ा है। देश एवं विदेश में रह रहे संथाली लुगु बाबा की पूजा अपने आराध्य देवता एवं धर्मगुरु के रूप में करते हैं। लुगु बुरु शब्द संथाल जनजाति की भाषा से लिया गया है। इसका अर्थ उनकी संस्कृति और परंपरा में गहरा महत्व रखता है।

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संथालों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पूजनीय

लुगु बाबा संथाल जनजाति के धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में एक पवित्र और श्रद्धेय देवता के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें प्रकृति और विशेष रूप से पर्वतों का संरक्षक माना जाता है। इस प्रकार, लुगु बुरु का शाब्दिक अर्थ होता है ‘श्रद्धेय देवता पहाड़।’ यह नाम उस पर्वत को संदर्भित करता है, जो संथाल समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत पूजनीय है। यह स्थान उनके आराध्य देवता की उपस्थिति और प्रकृति की पूजा के केंद्र के रूप में जाना जाता है। यह स्थान हरी-भरी पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। इसकी प्राकृतिक सुंदरता इसे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में परिभाषित करती है।

बोकारो जिले में प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल

लुगु बुरु घंटा बाड़ी धोरोम गाढ़ झारखंड के बोकारो जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है। यह स्थल संथाल जनजाति के लोगों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहां विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां और जीव-जंतु भी देखने को मिलते हैं। लुगु बुरु घंटा बाड़ी संथाल जनजाति के ‘सरना धर्म’ के मुख्य पूजा स्थलों में से एक है। इसे संथाल समाज का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थल माना जाता है। यह स्थान आदिवासी रीति-रिवाजों और परंपराओं के संरक्षण और पालन का प्रतीक है। यहां का शांत वातावरण और आध्यात्मिक आभा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊंचाई 200 से 540 मीटर (660 से 1,770 फीट) है।

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कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष धर्म महासम्मेलन का आयोजन

पहाड़ की तलहट्टी पर ऐतिहासिक लुगु बुरु घंटा बाड़ी धोरोम गाढ़ दोरबार चट्टान अवस्थित है। इस चट्टान पर सदियों पूर्व संथालों के पूर्वजों ने लुगु बाबा की अध्यक्षता में 12 वर्षों तक लगातार विचार-विमर्श कर संथाल समाज के सामाजिक प्रथा रीति-रिवाज (जन्म से मरण तक) की रचना की थी एवं संविधान बनाई थी। अभी भी कार्तिक पूर्णिमा के शुभ अवसर पर दो दिवसीय धर्म महासम्मेलन का आयोजन होता है, जिसे झारखंड राज्य का राजकीय महोत्सव होने का गौरव प्राप्त है।

पहाड़ की चोटी पर ऐतिहासिक गुफा ‘घिरी दोलन’ स्थित

इस महासम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में संथाल श्रद्धालु आते हैं और लुगु बाबा का दर्शन कर मन्नत मांगते हैं। इसमें सामाजिक उत्थान, भाषा, साहित्य, संस्कृति, धर्म एवं शिक्षा के विकास पर चर्चा की जाती है। पहाड़ की चोटी पर ऐतिहासिक गुफा (घिरी दोलन) अवस्थित है। इस गुफा के अंदर लुगु बाबा विराजमान हैं। यहां तक पहुंचने के लिए दोरबार चट्टान से 7 किलोमीटर का दुर्गम रास्ता तय करना पड़ता है। यहां प्रत्येक अमावस्या एवं पूर्णिमा सहित सालों भर श्रद्धालुओं का आगमन होते रहता है। यहां संथालियों का अंतरराष्ट्रीय सरना महाधर्म सम्मेलन औपचारिक रूप से 2001 में शुरू किया गया था।

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आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और परंपराओं का प्रतीक

लुगु बुरु का उल्लेख आदिवासी इतिहास में उनके पारंपरिक संघर्षों और स्वतंत्रता संग्राम में भी है। इसे ‘आदिवासी अस्मिता और संस्कृति’ का केंद्र माना जाता है। लुगु बुरु घंटा बाड़ी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और परंपराओं का जीता-जागता उदाहरण है। यह आदिवासी समुदाय की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करता है। लुगु बुरू की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय है नवंबर और दिसंबर, जब कार्तिक पूर्णिमा का मेला और पहाड़ी के ठंडे वातावरण का अनुभव एक साथ किया जा सकता है। लुगु बुरु तक का मार्ग पहाड़ी और घुमावदार है, इसलिए वाहन आरामदायक और सुरक्षित होना चाहिए। यदि आप ‘लुगु बुरु महोत्सव’ के समय (अक्टूबर-नवंबर) यात्रा करते हैं, तो सार्वजनिक परिवहन और विशेष व्यवस्थाएं मिल सकती हैं।

लुगु बुरु घाटी तक पहुंचने के लिए कई साधन उपलब्ध

सबसे नजदीकी हवाई अड्डा बिरसा मुंडा एयरपोर्ट (रांची) है, जो लुगु बुरु से लगभग 120-130 किमी की दूरी पर स्थित है। एयरपोर्ट से आप टैक्सी या बस के माध्यम से बोकारो और फिर लुगु बुरु पहुंच सकते हैं।

बोकारो स्टील सिटी रेलवे स्टेशन, लुगु बुरु के सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन है। यह भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। बोकारो स्टेशन से लुगु बुरु की दूरी लगभग 69 किमी है। धनबाद जिला के गोमो स्टेशन से लुगु बुरु की दूरी लगभग 62 किमी है। स्टेशन से आप टैक्सी या निजी वाहन किराए पर लेकर जा सकते हैं।

निकटतम बस स्टैंड, गोमिया, लालपानी रोड बोकारो पहुंचने के बाद, आप चंद्रपुरा या तुलिन रोड की तरफ से टैक्सी या स्थानीय वाहन से जा सकते हैं। झारखंड के रांची, धनबाद, हजारीबाग समेत कई शहरों से बोकारो तक नियमित बस सेवाएं हैं। (साभार – बोकारो जिला प्रशासन)

—–समाप्त—–

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