लोहे में नहीं लगा जंग, तस्वीरें आती हैं धुंधली, रहस्यों से घिरा झारखंड का धार्मिक स्थल (Photo: AI/Meta)
झारखंड को अक्सर खनिज संपदा और जंगलों के लिए जाना जाता है, लेकिन ये राज्य अपने ऐतिहासिक, धार्मिक और रहस्यमयी पर्यटन स्थलों के लिए काफी मशहूर है। यहां मौजूद कई ऐसे स्थल हैं, जिनसे जुड़ी कथाएं और मान्यताएं लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। इन जगहों पर पहुंचने के बाद ऐसा लगता है जैसे इतिहास और आस्था आज भी जीवित हों। ऐसे में आइए जानते हैं झारखंड के ऐसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल, जिनकी कहानियां आज भी लोगों को चौंका देती हैं…
गुमला का टांगीनाथ धाम
दरअसल, गुमला जिले से लगभग 75 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच स्थित टांगीनाथ धाम झारखंड के सबसे रहस्यमयी धार्मिक स्थलों में से एक है। इस धाम का संबंध सीधे रामायण काल से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि यह स्थान भगवान परशुराम से जुड़ा हुआ है। ये भी कहा जाता है कि आज भी यहां भगवान परशुराम का फरसा यानी टांगी जमीन में गड़ा हुआ है और उसमें कभी जंग नहीं लगी है।
माना जाता है जब भगवान राम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष तोड़ा, तब परशुराम क्रोधित होकर वहां पहुंचे थे। राम और लक्ष्मण से हुई बहस के बाद जब उन्हें ये पता चला कि राम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं, तो वो बेहद लज्जित हुए और फिर वो जंगलों के बीच इस स्थान पर आए और यहां भगवान शिव की स्थापना कर तपस्या करने लगे। उसी समय उन्होंने अपना फरसा जमीन में गाड़ दिया।
इस धाम से जुड़ा एक और रहस्य लोगों को हैरान करता है। कहा जाता है कि एक बार लोहार जाति के कुछ लोगों ने इस फरसे से लोहा निकालने की कोशिश की थी, लेकिन फरसा नहीं कटा। इसके बाद उस समुदाय के लोगों पर विपत्ति आई और वो एक-एक करके मरने लगे। तभी से इस क्षेत्र के 15 किलोमीटर के दायरे में लोहार जाति के लोग नहीं रहते हैं और यह भी माना जाता है आज भी ये स्थानीय लोगों के बीच काफी प्रचलित है।
बुंडू का देवड़ी मंदिर
रांची से जमशेदपुर जाने वाली सड़क पर, तमाड़ से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित देवड़ी मंदिर झारखंड का एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की खास पहचान यहां स्थापित सोलह भुजी देवी की प्रतिमा है, जिन्हें लोग सोलहभुजी माता के नाम से पूजते हैं।
माना जाता है कि सिंहभूम क्षेत्र के एक मुंडा राजा को अपने शत्रु से हार का सामना करना पड़ा था। हार के बाद उन्होंने देवड़ी में मां दशभुजी की आराधना की और प्रतिमा की स्थापना की। मां की कृपा से राजा ने दोबारा अपने शत्रु को पराजित कर राज्य वापस पा लिया।
इस मंदिर की बनावट भी बेहद अनोखी है। इसे पत्थरों को बिना जोड़ के एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया है। मान्यता है कि सम्राट अशोक भी इस मंदिर में दर्शन करने आए थे। इतिहास में यह भी कहा जाता है कि काला पहाड़ ने इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन वह असफल रहा।
एक और खास बात ये है कि मंदिर के अंदर की पुरानी संरचना की तस्वीर लेने की कोशिशें हमेशा नाकाम रही हैं। कई लोगों ने फोटो खींचने का प्रयास किया, लेकिन तस्वीरें धुंधली आ जाती हैं। इसके अलावा, 1831-32 के कोल आंदोलन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों द्वारा चलाई गई गोलियों के निशान आज भी मंदिर की दीवारों पर मौजूद हैं।
गढ़वा का बाबा बंशीधर मंदिर
गढ़वा जिले के नगरऊंटारी में स्थित बाबा बंशीधर मंदिर झारखंड का एक प्रमुख कृष्ण मंदिर है। यहां भगवान श्रीकृष्ण की बंशीधर रूप में अद्भुत प्रतिमा स्थापित है, जिसकी ऊंचाई लगभग साढ़े चार फीट है। कहा जाता है कि यह प्रतिमा 32 मन सोने से बनी है और इसकी वर्तमान कीमत लगभग 2500 करोड़ रुपये बताई जाती है।
इस मंदिर की स्थापना की कहानी भी बेहद चमत्कारी भी है। साल 1885 में नगरऊंटारी के महाराज भवानी सिंह की पत्नी रानी शिवमानी कुंवर को जन्माष्टमी की रात सपने में भगवान कृष्ण ने दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि उनकी प्रतिमा कनहर नदी के पास शिवपहरी पहाड़ी में जमीन के नीचे दबी हुई है। अगले दिन खुदाई कर प्रतिमा को बाहर निकाला गया।
माना जाता है कि जब प्रतिमा को हाथी पर रखकर नगरऊंटारी किले ले जाया जा रहा था, तो हाथी मुख्य द्वार पर जाकर बैठ गया और आगे नहीं बढ़ा। तब रानी ने वहीं मंदिर बनवाने का निर्णय लिया।
इस मंदिर से जुड़ी एक और कहानी 1930 की चोरी से संबंधित है, जब भगवान की बंशी और छतरी चोरी हो गई थीं। कहा जाता है कि चोर अंधे हो गए और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। बाद में राज परिवार ने नई स्वर्ण बंशी और छतरी बनवाकर मंदिर में स्थापित करवाई।
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