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जोहार दुमका, 3 मार्च। देशभर में रंगों के त्योहार होली 2026 (Holi 2026) का उत्साह है। वहीं, झारखंड के संथाल आदिवासी बहुल गांवों में पानी और फूलों की होली का सिलसिला कई दिनों तक जारी रहेगा। इसे संथाली समाज में बाहा पर्व (Santhal Baha Parv) के नाम से जाना जाता है। यहां की परंपराओं में किसी पुरुष को इजाजत नहीं है कि वह किसी कुंवारी लड़की पर रंग (Rang Lagane Ke Niyam) डाले। इस समाज में रंग-गुलाल लगाने के कई नियम हैं। अगर किसी युवक ने समाज की किसी कुंवारी लड़की पर रंग डाल दिया तो उसे लड़की से शादी करनी पड़ती है। ऐसा नहीं करने पर भारी जुर्माना भरना पड़ता है।
बाहा के दिन पानी डालने को लेकर नियम
कुछ गांवों में बाहा पर्व होली से पहले ही मनाया जा चुका है। दूसरी तरफ, कुछ गांवों में होली के बाद अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाता है। बाहा का मतलब ‘फूलों के पर्व’ से है। इस दिन संथाल आदिवासी समुदाय के लोग तीर-धनुष की पूजा करते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर जमकर थिरकते हैं और एक-दूसरे पर पानी डालते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि बाहा के दिन पानी डालने को लेकर भी नियम हैं। जिस रिश्ते में मजाक चलता है, पानी की होली उसी के साथ खेली जा सकती है। यदि किसी युवक ने किसी कुंवारी लड़की पर रंग या पानी डाला तो समाज की पंचायत उस युवक की लड़की से शादी करवा देती है। यहां तक कि अगर लड़की को शादी का प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ तो समाज रंग डालने के जुर्म में युवक की सारी संपत्ति लड़की के नाम करने की सजा सुना सकता है।
संथाल समाज में प्रकृति की पूजा का रिवाज
यह नियम झारखंड के पश्चिम सिंहभूम से लेकर पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी तक के इलाके में प्रचलित है। इसी डर से कोई संथाली युवक किसी युवती के साथ रंग नहीं खेलता। परंपरा के मुताबिक, पुरुष केवल पुरुष के साथ होली खेल सकता है। पूर्वी सिंहभूम जिले में संथालों के बाहा पर्व की परंपरा के बारे में समाज के लोग बताते हैं कि हमारे समाज में प्रकृति पूजा का रिवाज है। बाहा पर्व में समाज के लोग साल के फूल और पत्ते कान में लगाते हैं। इसका अर्थ है कि जिस तरह पत्ते का रंग नहीं बदलता, हमारा समाज भी अपनी परंपरा को अक्षुण्ण रखेगा। बाहा पर्व पर पूजा कराने वाले को नायकी बाबा के रूप में जाना जाता है। पूजा के बाद वह सखुआ, महुआ और साल के फूल बांटते हैं।
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कई जगहों पर अतु बाहा का भव्य आयोजन
इस पूजा के साथ संथाल समाज में शादी-विवाह का सिलसिला शुरू होता है। संथाल समाज में ही कुछ जगहों पर रंग खेलने के बाद वन्यजीवों के शिकार की परंपरा है। शिकार में जो वन्यजीव मारा जाता है, उसे पकाकर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। कई जगहों पर अतु बाहा का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक वाद्य-यंत्रों की थाप पर साल और महुआ के फूलों के साथ प्रकृति की पूजा करते हैं। वहीं, ‘दिशोम बाहा’ को भी पूरे उत्साह से आयोजित किया जाता है। यह एक केंद्रीय समागम है, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के लोग एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करते हैं।
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